कुँवर जावेद
वो जिसके जो भी हों मनसूबे अपने पास रखे
जो नेकनाम है बदनाम हो नहीं सकता
यहाँ की मिट्टी तो सबको गले लगाती है
यहाँ तो ख़तरे में इस्लाम हो नहीं सकता
हरेक धर्म का बस मूल बाँटने का है
तिलक के वास्ते गो-धूल बाँटने का है
यहाँ की मिट्टी में ख़ुश्बू की खेती होती है
यहाँ रिवाज़ तो बस फूल बाँटने का है
वो चाहे कितना भी पानी समेट लो यारो
कभी भी गंगा की रौ में कमी नहीं आती
कि इक चिराग़ से जलते कई चिराग़ मग़र
किसी चिराग़ की लौ में कमी नहीं आती
वफ़ा की प्यार की सरगम नहीं समझता है
किसी भी देश का परचम नहीं समझता है
है कौन हिन्दू है सिख कौन और मुस्लिम क्या
ये हम समझते हैं ये बम नहीं समझता है
हमेशा अपने लहू से ज़मीन सींचते थे
कि पतझरों में भी बनकर बहार आए हैं
दिए से शहर जलाते हैं आजकल कुछ लोग
बुज़ुर्गों ने तो दिए से दिए जलाए हैं
निहत्थे लोग भी जंगल में शाम करते हैं
तो गाय-बैल के घर शेर काम करते हैं
ये शिव के होने का सबसे बड़ा नमूना है
कि मोर साँप को झुककर सलाम करते हैं
किसी जादू किसी मंतर से नहीं आए हैं
एक दरिया हैं समंदर से नहीं आए हैं
हम कुँवर हैं कोई जावेद जो भी हैं लेकिन
इसी मिट्टी के हैं बाहर से नहीं आए हैं
किसी के जाने से क़िस्से नहीं बदल जाते
तो सूर्य ढलने से साये नहीं बदल जाते
सुनो तो मिट्टी की ख़ुश्बू ये कह रही है कुछ
जगह बदलने से पुरखे नहीं बदल जाते
ख़ुशी भी इसकी है और सारे ग़म भी इसके हैं
अजान-ओ-आरती वाले सनम भी इसके हैं
ये सब ही कहते हैं हिन्दोस्तां हमारा है
मग़र ये कोई नहीं कहता हम भी इसके हैं
कुँवर जावेद
वो जिसके जो भी हों मनसूबे अपने पास रखे
जो नेकनाम है बदनाम हो नहीं सकता
यहाँ की मिट्टी तो सबको गले लगाती है
यहाँ तो ख़तरे में इस्लाम हो नहीं सकता
हरेक धर्म का बस मूल बाँटने का है
तिलक के वास्ते गो-धूल बाँटने का है
यहाँ की मिट्टी में ख़ुश्बू की खेती होती है
यहाँ रिवाज़ तो बस फूल बाँटने का है
वो चाहे कितना भी पानी समेट लो यारो
कभी भी गंगा की रौ में कमी नहीं आती
कि इक चिराग़ से जलते कई चिराग़ मग़र
किसी चिराग़ की लौ में कमी नहीं आती
वफ़ा की प्यार की सरगम नहीं समझता है
किसी भी देश का परचम नहीं समझता है
है कौन हिन्दू है सिख कौन और मुस्लिम क्या
ये हम समझते हैं ये बम नहीं समझता है
हमेशा अपने लहू से ज़मीन सींचते थे
कि पतझरों में भी बनकर बहार आए हैं
दिए से शहर जलाते हैं आजकल कुछ लोग
बुज़ुर्गों ने तो दिए से दिए जलाए हैं
निहत्थे लोग भी जंगल में शाम करते हैं
तो गाय-बैल के घर शेर काम करते हैं
ये शिव के होने का सबसे बड़ा नमूना है
कि मोर साँप को झुककर सलाम करते हैं
किसी जादू किसी मंतर से नहीं आए हैं
एक दरिया हैं समंदर से नहीं आए हैं
हम कुँवर हैं कोई जावेद जो भी हैं लेकिन
इसी मिट्टी के हैं बाहर से नहीं आए हैं
किसी के जाने से क़िस्से नहीं बदल जाते
तो सूर्य ढलने से साये नहीं बदल जाते
सुनो तो मिट्टी की ख़ुश्बू ये कह रही है कुछ
जगह बदलने से पुरखे नहीं बदल जाते
ख़ुशी भी इसकी है और सारे ग़म भी इसके हैं
अजान-ओ-आरती वाले सनम भी इसके हैं
ये सब ही कहते हैं हिन्दोस्तां हमारा है
मग़र ये कोई नहीं कहता हम भी इसके हैं
कुँवर जावेद
No comments:
Post a Comment