Wednesday, September 9, 2015

कुँवर जावेद

कुँवर जावेद
वो जिसके जो भी हों मनसूबे अपने पास रखे
जो नेकनाम है बदनाम हो नहीं सकता
यहाँ की मिट्टी तो सबको गले लगाती है
यहाँ तो ख़तरे में इस्लाम हो नहीं सकता

हरेक धर्म का बस मूल बाँटने का है
तिलक के वास्ते गो-धूल बाँटने का है
यहाँ की मिट्टी में ख़ुश्बू की खेती होती है
यहाँ रिवाज़ तो बस फूल बाँटने का है

वो चाहे कितना भी पानी समेट लो यारो
कभी भी गंगा की रौ में कमी नहीं आती
कि इक चिराग़ से जलते कई चिराग़ मग़र
किसी चिराग़ की लौ में कमी नहीं आती

वफ़ा की प्यार की सरगम नहीं समझता है
किसी भी देश का परचम नहीं समझता है
है कौन हिन्दू है सिख कौन और मुस्लिम क्या
ये हम समझते हैं ये बम नहीं समझता है

हमेशा अपने लहू से ज़मीन सींचते थे
कि पतझरों में भी बनकर बहार आए हैं
दिए से शहर जलाते हैं आजकल कुछ लोग
बुज़ुर्गों ने तो दिए से दिए जलाए हैं

निहत्थे लोग भी जंगल में शाम करते हैं
तो गाय-बैल के घर शेर काम करते हैं
ये शिव के होने का सबसे बड़ा नमूना है
कि मोर साँप को झुककर सलाम करते हैं

किसी जादू किसी मंतर से नहीं आए हैं
एक दरिया हैं समंदर से नहीं आए हैं
हम कुँवर हैं कोई जावेद जो भी हैं लेकिन
इसी मिट्टी के हैं बाहर से नहीं आए हैं

किसी के जाने से क़िस्से नहीं बदल जाते
तो सूर्य ढलने से साये नहीं बदल जाते
सुनो तो मिट्टी की ख़ुश्बू ये कह रही है कुछ
जगह बदलने से पुरखे नहीं बदल जाते


ख़ुशी भी इसकी है और सारे ग़म भी इसके हैं
अजान-ओ-आरती वाले सनम भी इसके हैं
ये सब ही कहते हैं हिन्दोस्तां हमारा है
मग़र ये कोई नहीं कहता हम भी इसके हैं

कुँवर जावेद

गति की गति


गति की गति



अभी तो वसंत-बयार बहना शुरू भी नहीं हुआ था.  आम के वृक्ष पर अभी मंजर भी नहीं आई थी. तभी शिशिर की ठंडी हवा का सामना करता हुआ एक कीट अपने घर से बाहर निकला. उसके परिजनों ने उसे बहुत समझाया कि अपने घर में रह कर आराम कर, कही बाहर निकलेगा तो सर्दी में मर जायेगा. परन्तु उसने किसी की एक नहीं सुनी. वह तो आम के पेड पर बड़ी कठिनाई के साथ चढ़ने लगा. पेड पर ऊँची शाखा पर झूलते हुए  तोते ने उसे देखा.अपनी गर्दन नीचे झुकाकर उसने पूछा:
अरे! क्षुद्र कीट! इस सर्दी में कहाँ जा रहा है?
“आम खाने के लिए.”
तोता हँसने लगा. उसे वह कीट मूर्खों का सरदार ही लगा. उसने व्यंग से कहा “ अरे मूर्ख! आम का तो कोई नाम निशान भी नहीं है. मै यहाँ से सब देख सकता हूँ ना”
“तू नहीं देख सकता तो क्या?” कीट ने डगमग चढ़ते हुए कहा. “परन्तु जब मैं ऊपर पहुचूंगा तब वहाँ आम होगा.”
कीट के इस उत्तर में साधक की जीवनदृष्टि रही है. कीट अपनी क्षुद्रता की ओर नहीं देख रहा है, प्रतिकूल परिस्थिति से भी वह भयभीत नहीं है. मंजिल का कोई चिन्ह भी नहीं दिखता हो फिर भी मंजिल की प्राप्ति में उसे श्रद्धा है. अपने हर कदम के साथ फल परिपाक का समय निकट आता जायेगा  इसमें उसे थोडा भी संदेह नहीं है. अपने आप्तस्वकीय या तोता पंडित कुछ भी कह रहे हों उसे इसकी परवाह नहीं है. उसके अंतर में है बस एक ही जिद  और एक ही रट:
हरि से लागे रहो मेरे भाई, तेरी बनत बनत बन जाई. 

मकरंद दवे – “सहज ने किनारे”          


शिक्षा और प्रचार


शिक्षा और प्रचार

                                                -यहूदी तत्त्वचिन्तक ‘मार्टिन ब्यूबर’
ब्यूबर ने एक दिन कहा-
असली रस्साकस्सी तो पूर्व और पश्चिम के बीच नहीं या पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच नही है बल्कि शिक्षा और प्रचार के बीच में है. शिक्षा का अर्थ है लोगों को उनके आसपास की वास्तविकता देखना सिखाना, उन्हें स्वयं ही उसकी समझ प्राप्त करने देना. प्रचार इससे एकदम दूसरे छोर की बात है. वह लोगों को कहता है “आपको जैसा हम चाहते है वैसा विचार करना चाहिये.”
शिक्षा लोगों को ऊँचाई पर ले जाती है. वह उनके ह्रदय को खोलती है और उनके मन का विकास करती है जिससे वे स्वयं ही सत्य को खोज सकें और उसे अपना सकें. दूसरी ओर प्रचार उनके ह्रदय को बंद कर देता है और उनके मन को कुंठित कर देता है. यह सच है या नहीं ऐसा प्रश्न स्वयं को बिना पूछे ही जड़ सिद्धांतों को स्वीकार करने के लिए बाध्य करता है.
कठिनाई यह है कि यह मात्र दो विचारधाराओं के बीच का संघर्ष नहीं है बल्कि दो गतियों के बीच का संघर्ष है. प्रचार कि गति का एक जोश होता है, एक अस्वस्थता होती है. यह टेलिविजन और रेडियो की गति है. यह अखबार के हेडलाइन्स की और रास्तेमें चिल्ला चिल्ला कर बेचने वाले विक्रेता की गति है.जब कि शिक्षण तो अत्यंत धीमी गति से होता है. उसकी गति अपने छात्रों के साथ वार्तालाप करने वाले शिक्षक की गति है, एकांत में स्वाध्याय कर रहे व्यक्ति की गति है. उसे बहुत तेज कर दिया जाये तो फिर वह शिक्षा नहीं रहेगी.
“तो फिर” मैंने पूछा, “क्या अंत में प्रचार की ही जीत होती है? तेज गति क्या धीमी गति को हमेशा परास्त कर देती है?”
“नहीं”, उन्होंने कहा: “कुछ लोग ऐसा मानते है कि सन्देश-व्यवहार  के समान ही गति के क्षेत्र में भी तेज गति अर्थात प्रगति है. परन्तु इतिहास इस तरह नहीं बनता है. दुनिया को बदलने वाली और रचने वाली शक्ति तो सतह के नीचे गहराई में रहती है. इसलिये उसकी गति धीमी होती है. असली इतिहास तो इस धीमी गति का ही इतिहास है. प्रश्न यह है कि क्या इतने प्रमाण में लोग होंगे जों इस उत्तेजित जोश के पीछे रही भ्रामकता को देख सकेंगे, उसके प्रलोभन को टाल सकेंगे और धीमी गति के सत्य के साथ निष्ठापूर्वक डटकर खड़े रहेंगे?”


श्री मकरंद दवे – “सूर्यनी आमंत्रण पत्रिका”  पृष्ठ-१२१