गति की गति
अभी तो वसंत-बयार बहना शुरू भी नहीं हुआ
था. आम के वृक्ष पर अभी मंजर भी नहीं आई
थी. तभी शिशिर की ठंडी हवा का सामना करता हुआ एक कीट अपने घर से बाहर निकला. उसके
परिजनों ने उसे बहुत समझाया कि अपने घर में रह कर आराम कर, कही बाहर निकलेगा तो
सर्दी में मर जायेगा. परन्तु उसने किसी की एक नहीं सुनी. वह तो आम के पेड पर बड़ी
कठिनाई के साथ चढ़ने लगा. पेड पर ऊँची शाखा पर झूलते हुए तोते ने उसे देखा.अपनी गर्दन नीचे झुकाकर उसने
पूछा:
अरे! क्षुद्र कीट! इस सर्दी
में कहाँ जा रहा है?
“आम खाने के लिए.”
तोता हँसने लगा. उसे वह कीट
मूर्खों का सरदार ही लगा. उसने व्यंग से कहा “ अरे मूर्ख! आम का तो कोई नाम निशान भी नहीं है. मै यहाँ से
सब देख सकता हूँ ना”
“तू नहीं देख सकता तो क्या?” कीट ने डगमग चढ़ते हुए कहा. “परन्तु जब मैं ऊपर पहुचूंगा तब वहाँ आम होगा.”
कीट के इस उत्तर में साधक की जीवनदृष्टि रही है. कीट अपनी क्षुद्रता की ओर
नहीं देख रहा है, प्रतिकूल परिस्थिति से भी वह भयभीत नहीं है. मंजिल का कोई चिन्ह
भी नहीं दिखता हो फिर भी मंजिल की प्राप्ति में उसे श्रद्धा है. अपने हर कदम के
साथ फल परिपाक का समय निकट आता जायेगा इसमें उसे थोडा भी संदेह नहीं है. अपने
आप्तस्वकीय या तोता पंडित कुछ भी कह रहे हों उसे इसकी परवाह नहीं है. उसके अंतर
में है बस एक ही जिद और एक ही रट:
हरि से लागे रहो मेरे भाई, तेरी बनत बनत बन जाई.
मकरंद दवे – “सहज ने किनारे”
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