शिक्षा और प्रचार
-यहूदी तत्त्वचिन्तक
‘मार्टिन ब्यूबर’
ब्यूबर ने एक दिन कहा-
असली रस्साकस्सी तो पूर्व
और पश्चिम के बीच नहीं या पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच नही है बल्कि शिक्षा और
प्रचार के बीच में है. शिक्षा का अर्थ है लोगों को उनके आसपास की वास्तविकता देखना
सिखाना, उन्हें स्वयं ही उसकी समझ प्राप्त करने देना. प्रचार इससे एकदम दूसरे छोर
की बात है. वह लोगों को कहता है “आपको जैसा हम चाहते है वैसा
विचार करना चाहिये.”
शिक्षा लोगों को ऊँचाई पर
ले जाती है. वह उनके ह्रदय को खोलती है और उनके मन का विकास करती है जिससे वे
स्वयं ही सत्य को खोज सकें और उसे अपना सकें. दूसरी ओर प्रचार उनके ह्रदय को बंद
कर देता है और उनके मन को कुंठित कर देता है. यह सच है या नहीं ऐसा प्रश्न स्वयं
को बिना पूछे ही जड़ सिद्धांतों को स्वीकार करने के लिए बाध्य करता है.
कठिनाई यह है कि यह मात्र
दो विचारधाराओं के बीच का संघर्ष नहीं है बल्कि दो गतियों के बीच का संघर्ष है.
प्रचार कि गति का एक जोश होता है, एक अस्वस्थता होती है. यह टेलिविजन और रेडियो की
गति है. यह अखबार के हेडलाइन्स की और रास्तेमें चिल्ला चिल्ला कर बेचने वाले विक्रेता
की गति है.जब कि शिक्षण तो अत्यंत धीमी गति से होता है. उसकी गति अपने छात्रों के
साथ वार्तालाप करने वाले शिक्षक की गति है, एकांत में स्वाध्याय कर रहे व्यक्ति की
गति है. उसे बहुत तेज कर दिया जाये तो फिर वह शिक्षा नहीं रहेगी.
“तो फिर” मैंने पूछा, “क्या अंत में प्रचार की ही जीत होती है? तेज गति क्या धीमी गति को हमेशा
परास्त कर देती है?”
“नहीं”, उन्होंने कहा: “कुछ लोग ऐसा मानते है कि सन्देश-व्यवहार
के समान ही गति के क्षेत्र में भी तेज गति अर्थात प्रगति है. परन्तु इतिहास
इस तरह नहीं बनता है. दुनिया को बदलने वाली और रचने वाली शक्ति तो सतह के नीचे
गहराई में रहती है. इसलिये उसकी गति धीमी होती है. असली इतिहास तो इस धीमी गति का
ही इतिहास है. प्रश्न यह है कि क्या इतने प्रमाण में लोग होंगे जों इस उत्तेजित
जोश के पीछे रही भ्रामकता को देख सकेंगे, उसके प्रलोभन को टाल सकेंगे और धीमी गति
के सत्य के साथ निष्ठापूर्वक डटकर खड़े रहेंगे?”
श्री मकरंद दवे – “सूर्यनी आमंत्रण पत्रिका” पृष्ठ-१२१
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